मुक्तक


सज़ा कर फूल डालों पर, फिज़ा है छा रही देखो.
सदाएँ दे रही रुत ये सुहानी गा रही देखो.
चले बहकी पवन, खुशबू उड़े, झूमे चमन सारा
सुनी जो तान भँवरे की, कली शरमा रही देखो.


कर गए मदहोश हमको, वो पिला कर जाम इक.
भूल कर सारा जहाँ, रटते रहे बस नाम इक.
याद फिर कोई हमें करने लगा है आजकल
फिर उडी खुशबू हवा में, दे गयी पैगाम इक.
(c) विनिता सुराना 'किरण'

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