एक शाम या कर्ज़

एक अरसे बाद तुमसे बात हुई तो जैसे ख़ुद से मुलाक़ात हुई, कुछ फ़ासले तय हुए, अपनी ही बातों के मायने समझ पायी। न जाने ये वक़्त हमारे बीच से कब गुज़रा, क्या तुमने देखा ? तुमने कहाँ मैंने छोड़ दिया तुम्हें पर मैंने अधिकार ही कब चाहा था तुम पर? तुम एक खूबसूरत एहसास हो जो मेरे साथ हमेशा रहा, तब से अब तक, एक सिरे पर ठहरा वक़्त आज फिर वहीं से चल पड़ा और हाथों में हाथ लिए हम भी क़दम मिला जाने कहाँ-कहाँ घूम आये । कभी बारिशें भिगो गयीं, तो कहीं पहाड़ों ने आग़ोश में ले लिया, नदी की धारा हमारे कदमों को चूमती रही और हम एक दूसरे में खोए बस बतियाते रहे घंटों तक। हाँ कुछ कविताएँ भी गुज़री हमारे आसपास से, मैं गुनगुनाती रही, भीगती रही और जाने कब एक बूंद छलक आयी । तुम सांस रोके घुलते रहे मेरे एहसासों के नमक में और इस बीच जाने वक़्त कहाँ सरक गया चुपके से।
      एक पूरी शाम का कर्ज़ हम पर चढ़ा कर वक़्त मुस्कुराता रहा मानो कोई एहसान उतारा हो इतने लंबे अरसे की चुप्पी का । 

#सुन_रहे_हो_न_तुम

❤️ किरण

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