कुछ देर और ठहर

पलंग के दायीं ओर वाले दरीचों पर सहर की महीन सी दस्तक, अलसाये से कमरे में कुछ परछाइयाँ देखते ही देखते लुप्त हो जाती हैं । मीठी नींद की ख़ुमारी, लाल डोरियां आंखों में, उस पर घुल जाता है हया का रंग जैसे गुलाबी गुलाल उड़ाया हो नाज़ुक हाथों ने,  बीती रात की मदहोशी में बेपरवाह छूटी निशानियां बिखरी पड़ी हैं रेशमी चादर की सिलवटों में, घिसे हुए कालीन के उधड़ते रुओं में कहीं अटके हैं इक्के दुक्के बाल, आधे भरे गिलास में पानी ही था न तो फिर कल रात वो सुरूर, वो मदहोशी ? गुलाबी आंखों में अलसुबह सैर को निकला ख़्वाब आख़िरी कुछ लम्हों को कब्ज़ाने के लालच में आख़िर आ ही जाता हैं गिरफ्त में ...झेंप जाता हैं जैसे चोरी पकड़ी गई हो। हाँ बड़े शातिर चोर होते हैं ये ख़्वाब ... चुपके से घुसपैंठ करते है रात की चादर में छुपते-छुपाते और जाने कब मन पर वशीकरण कर अपनी ही धुन पर झूमने को विवश कर देते।
    सुब्ह का संगीत बेशक़ ख़ुशनुमा होता पर सुनो मुझे तो रात की ख़ामोश धुन ही पसंद है। वो तन्हाई, तन्हाई में लिपटा सुकून, सुकून में घुली मदहोशी ... शाम के कोमल रंगों को दामन में सजाएं प्रेयसी रात जाने कैसी मय घोल देती है उस सादे पानी में कि ख़ुमार जाता ही नहीं, या उस ख़्वाब की तासीर ही ऐसी है कि अब भी आंच आती है साँसों से । वो बेचैनी, वो सुरूर, वो छुअन सभी तो अंकित हैं मन की परतों में ... सुनो ये भीनी सी महक भी तो छोड़ गए हो अपने पीछे तुम !

#सुन_रहे_हो_न_तुम

©विनीता किरण

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