कान्हा (मुक्तक)

करो चाहे जतन जितने नहीं मानूँ अभी कान्हा।
मगन तुम गोपियों में थे, तरसती मैं रही कान्हा।
बजा कर मोहिनी बंसी सभी को तुम लुभाते हो,
कहो क्या आज तक बंसी, मेरी ख़ातिर बजी कान्हा। (1)

राह से पनघट की कान्हा, यूँ न भटकाओ मुझे।
इस तरह बातें बनाकर, अब न बहलाओ मुझे।
डाँट मैया से पड़ेगी, देर से पहुँची अगर,
आज बंसी की धुनों से फिर न बहकाओ मुझे। (2)
©विनीता सुराना 'किरण'

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