किताब (नज़्म)

पन्ने दर पन्ने खुलते
कुछ अनकहे
कुछ अनजाने
कुछ अपने
कुछ बेगाने से एहसास
सिमटी है पूरी कायनात
सियाह-ओ-सफ़ेद हर्फ़ों में
कुछ अलफ़ाज़ मुहब्बत के
कुछ कतरे दर्द के
किस्से दोस्ती के
बेवफ़ाई के
सिमटी है यादें
महकती सी
सिसकती सी
अबूझ सी पहेलियाँ कल की
अधखिली ख्वाहिशें
अधूरे ख्व़ाब
क़लमबंद है सभी कुछ
मगर कब पढ़ पाए हम
वक़्त से पहले
जो तय किया
उस क़लमकार ने
क्यूंकि वही तो
क़लमकश है
वही कारसाज़ भी
उस 'किताब' का
जिसे कहते है 'ज़िन्दगी' |
©विनिता सुराना 'किरण'

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