वो महक सौंधी सी

गीली मिट्टी सी
हर दिन ढलती रही
लेती रही एक नया रूप
जीवन के चाक पर
बदलते रहे हाथ
गढ़ते रहे नए रिश्ते
जिन्हें समझ के अपना
करती रही समर्पण......
नासमझ थी तुम
कहाँ समझ पायी
सुराही का साथ भी
भाता है प्यास तक
दो घड़ी ठहरे पथिक पर
अधिकार नहीं वृक्ष का......
मिल जाने दो इस मिट्टी को
अब समय की धारा में
बहने दो फिर से उसी तरह
उन्मुक्त और निश्छल
बिखरने दो फिर वही
सौंधी सी कच्ची सी महक......
©विनिता सुराना 'किरण'

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