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चाहत इश्क़ मुहब्बत

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दर्द भी है, रंजो-गम भी, सैलाब सा ले आते हैं चश्म, अश्क़ बहते है बेसाख़्ता, वज़ह कम तो न दी ज़िन्दगी ने ग़मगीन होने की... क़लम भी तड़प उठी अक़्सर कुरेदने को लहू में भीगे अल्फ़ाज़ ज़िन्दगी के खु...

घात

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नफरतों की भीड़ में खोने लगे एहसास, शोर सी लगती हैं आहटें भी, हर नज़र चुभती लगी, सहमी सी साँसें भीगे हैं ख़्वाब, क्यूँ रुसवा हुई है ज़िन्दगी बता... ऍ मेरे ख़ुदा ! क्या मेरी ख़ता ? मिट्टी थ...

ड़ोर

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कुछ दर्द हैं एहसास भी हम दूर हैं कुछ पास भी कुछ बात है कुछ ख़ास है इक डोर है जो थाम के हम मिल रहे हैं आज भी >>>>> © विनीता सुराना 'किरण'

तुम

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कल फिर कुछ लम्हें चुरा लायी हवा माज़ी के पन्नों से ... फिर महक उठी तन्हाईयाँ, जी उठी कुछ पल के लिए सूनी सी डायरी, फिर बुने ताने-बाने अल्फाज़ की चादर में कुछ हसीन ख़्वाब, कुछ मीठी सी ख़...

यादें

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रात के आग़ोश में कुछ ख़्वाब कसमसाए थे, जाने क्यूँ .. शबनम के कुछ क़तरे अब भी लिपटे है मेरी पलकों से, शायद वो भीनी सी महक तुम्हारी अब भी वाबस्ता है मेरी साँसों से ! ©विनीता सुराना 'कि...

इंसानियत

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कहाँ खो गयी तुम ? कहाँ ढूँढू तुम्हें ? बेरहमी से क़त्ल हुआ तुम्हारा या कहीं ज़िंदा जला दिया तुम्हें ? अब राख़ में दबी हैं चिंगारियाँ, धधकने को आतुर... शमसान सी नीरवता को चीरती है तो ...

पहरा

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बिंदी भी है काज़ल भी लाली है ... मांग में , लबों पर , आँखों में भी ! अजब सा नशा है पर फिर भी 'किरण' कुछ तो अधूरा सा है.... मन पर आज पहरा सा है ! ©विनीता सुराना 'किरण