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ग़ज़ल

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खोल कर दिल के दरीचे रौशनी आने भी दो   चश्म को सैलाब खुलकर अब ज़रा लाने भी दो ज़ख्म गर ढकते रहे तो भर नहीं पाते कभी तोड़ कर मन का कफ़स ये दर्द बह जाने भी दो राज़ देखो खुल रहे है टूटने है दिल कई वो कसम झूठी जो खाए अब उन्हें खाने भी दो खैरियत सबकी रहे कुछ और मैं मांगूँ नहीं अब तराने प्रेम के हर शख्स को गाने भी दो उम्र भर ढूंढा ‘ किरण ’ बस एक कतरा छाँव का   दो घडी को आज ठहरो कुछ सुकूँ पाने भी दो -विनिता सुराना ‘ किरण ’

मंथन

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उमड़ते-घुमड़ते है मन में कभी जब बादल मंथन के सोचा करती हूँ आसान था बहुत एक राय बनाना तुम्हारे बारे में पर मुश्किल तुम्हारे अंतर्मन को जानना और देख पाना   अनगिनत दर्द भरे एहसास जो कभी-कभी रोक नहीं पाते चाहकर भी तुम और बह निकलते है एक सैलाब की तरह तोड़कर तुम्हारे अपने बनाए हुए बाँध और तब देख पाती हूँ   परतों में छुपे ‘ तुम ’ को , तुम्हारे निर्मल अंतर्मन को तभी थाह मिलती है उन गहरे अँधेरों की जिनमें तुम अक्सर छुप जाते हो , जब बोझिल होती है आँखें अनगिनत खोज-दीपों की रौशनी से , एक मासूम बच्चे का अक्स ठहर जाता है मन की आँखों में और घुल जाते है सारे गिले-शिकवे उस खारे जल में. -विनिता सुराना ‘ किरण ’

ग़ज़ल

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मिटा कर हर ख़ुशी अपनी लिये है दर्द अब हमने जले अरमां चरागे दिल जलाये आज जब हमने दिए है गम बहुत तुमने मगर शिकवा करें तो क्या दुआ तेरे लिये की है तुझे ही मान रब हमने मिले थे इत्तिफाकन हम चले थे हमकदम बनकर मुहब्बत का भला सोचा यहाँ अंजाम कब हमने कहीं जो तुम गुज़र जाओ उन्हीं राहों से फिर इक दिन चुभन कोई न हो तुमको चुने थे खार तब हमने न तुम आये न ख़त कोई न पल भर को ' किरण ' सोई वफ़ा की राह में तनहा सहे है ज़ख्म सब हमने - विनिता सुराना ' किरण '