चिरयुवा_प्रेम

"सुनो बहुत याद आती हैं वो सब बातें ... वो साझा सपने और उनमें ज़िंदा हम .."
"मत याद दिलाओ, मत दिखाओ वो सपने .."
"जिन्हें देख लिया उन्हें क्या दिखाऊँ, क्या याद दिलाऊँ.. खैर नहीं कहूंगी अब कुछ भी .."
उसे अनमना सा देख वो भी उदास हो जाया करती पर क्या करती आखिर उन सपनों का जो इबारत की तरह लिखे हुए थे दिल पर और बेग़ैरत वक़्त भी नहीं मिटा पाया जिन्हें ...
हर गुज़रते पल में सपनों से बुना वो पुल तड़क रहा था धीरे-धीरे और हर छिटकती किरचन उठा रही थी एक दीवार उनके बीच ... 
यही नियति थी शायद उस बेमेल मोहब्बत की !
तो क्या हुआ कि उसका प्रेमिल मन सालों बाद भी उन गलियों में ठहरा हुआ था जहाँ वो अपनी उम्र को पीछे छोड़ आयी थी..... 
जाने क्यों वो सपने न कभी टूटे, न बोझिल हुए बस अपनी महक से भिगोते रहे और फिर एक दिन अपने साथ ही ले गयी वो उन्हें .... 


Comments

Popular posts from this blog

Chap 20 Can Life Take A U-turn

The Unsent Letter

ज़ायके से जश्न-ए-बहारा तक