कितने सवाल !

बचपन में अक्सर धर्म-कर्म की बातों से ऊब होती थी जब धर्म-गुरुओं की कथनी-करणी में फर्क़ दिखाई देता, ऐसे में सवाल उठाने पर अक्सर दादी कहतीं, "क्यों निंदा करते हो ? वे हमसे तो लाख दर्ज़ा अच्छे हैं, कुछ तो त्याग करते हैं । हम तो इतना भी नहीं कर पाते ।"
     तब भी मन यही कहता कि अगर त्याग किया या वैराग्य लिया तो स्वेच्छा से लिया उन्होंने, किसी ने जोर-जबरदस्ती तो नहीं की थी कि गृहस्थ मत रहो, दुनिया के संसाधनों का त्याग कर दो, दर-दर भटको। अगर स्व-कल्याण की सोच थी सन्यास के पीछे तो ये भी स्वार्थ था, जन-कल्याण का श्रेय किस तरह लिया जा सकता ? अपना कर्म-क्षेत्र चुनना अगर अधिकार है तो उसके कर्त्तव्य पालन के लिए अन्यों पर एहसान क्यों ?
       हमसे बेहतर हैं बहुत मगर इससे उन्हें ये अधिकार नहीं मिल जाता कि उनकी गलत बात का विरोध भी न हो !
       बात केवल धर्म से ही संबंधित नहीं प्रत्येक कर्म-क्षेत्र से संबंध रखती है । हम सब स्वतंत्र हैं एक हद तक अपना कर्मक्षेत्र चुनने के लिए, चाहे हम नाम जनसेवा दें, समाजसेवा दें, देशसेवा दें या व्यापार .. हम स्वयं अपने कर्म के लिए उत्तरदायी हैं और अगर हम ये सोचते हैं कि बाकी सब हमारे एहसान तले दबे रहें तो ये कहीं न कहीं आत्म-मुग्धता की और बढ़ना होगा। हाँ वाज़िब अधिकार सभी का अधिकार है पर इससे ज्यादा की चाह उचित नहीं .. कतई नहीं 💕

❤️किरण

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