दास्तान-ए-इश्क़

वो  दास्तान-ए-इश्क़ का हसीं सफ़र था,  
वो लंबी काली रात की उजली सहर था!

हर अहसास हर छुअन पर सिहरता जो,
अनछुए मन पर उसका बेहद असर था!

जिसे दवा समझे थे अपने दर्द की हम,
वो बस बेहिसाब दर्द देने वाला कहर था!

कहता था सागर है, समा लेगा बाहों में,
रीता कर गया हमें, जो कहने को घर था!

रंग भरने की बात करके बेरंग कर गया, 
जो इश्क़ के गाढ़े लाल रंग में तरबतर था!

तूफानों में भी डूबी नहीं थी कश्ती मगर,
कहाँ जानती थी उसे तो लहरों से डर था!

गुज़रा था अहसास तो देह से होकर भी,
मगर रूह में भी हमारी उसका बसर था!

💖किरण

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