वो बेवफ़ा रात और बरसात

भीगी सी कल की रात 
वो शबनमी सी बरसात
भीनी सी खुशबू तेरे संग बुनी यादों की,
हमारे सुर्ख़ जज़्बातों की,
कहे-अनकहे वादों की,
उमड़ते-घुमड़ते अहसासों की....
बैरन इस सुबह की सरगोशियों में
फिर समेट रही हूँ हमेशा की तरह
किर्चियाँ उन अधूरे से ख़्वाबों की...
क्या शिक़वा कैसी शिक़ायत करूँ
वो रात ही थी बेवफ़ा, जो सुबह होते ही दगा दे गयी !

❤️🌹किरण

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