प्यार की तरह

अपने ख़्यालों के परिंदों को हौले से छोड़कर आसमान में,
दूर ...बहुत दूर जाते अक़्सर देखना
धीरे-धीरे अल्फ़ाज़ में ढलकर फिर उन्हें लौटते भी देखना कविताओं, कहानियों की शक़्ल में ! 
यही से तो आगाज़ होगा उस सफ़र का
जो तय करेगा हर उस रिश्ते का ताना-बाना जिसे गढ़ने तुम्हें भेजा गया दुनिया में
यही वह सफ़र होगा 
जो ख़ुद से ख़ुद के रिश्ते को अंजाम तक पहुंचा दे शायद...
इस सफ़र के तज़ुर्बों पर फिर कई किताबें लिखी जाएंगी
उनमें उभरे कुछ अल्फ़ाज़ होंगे 
जो वज़्न में भले ही ज़ियादा हों
पर सुनो,
सिर्फ एक ही लफ्ज़ है,
जो उन सारे बड़े और बोझिल से लगते अल्फ़ाज़ को सही मायने देता है 
'प्यार'
परिंदों की उड़ान भी परों के बिना संभव कहाँ ?
हाँ वही 'पर' जो नाज़ुक और हल्के हों बिल्कुल 'प्यार' की तरह !

❤️🌹 किरण

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