'तुम'और 'हम'

तुमसे मिलकर लगा कुछ तो था जो अधूरा था ...
जब से आ कर गए तुम तो लगता था रीत गयी।
जब आये नहीं थे तो भरा सा रहता था मन तुम्हारे ख़्याल से
जो गए तो मन में खालीपन और बाहर पसरी तन्हाई थी !

तब भी खुश थी मैं, जब नहीं थे पास तुम
क्योंकि इंतज़ार था तुम्हारे आने का ...
जो गए तो पास भी नहीं, इंतज़ार भी नहीं, 
आस भी नहीं और सहेजने को याद भी नहीं !

ये कैसी मोहब्बत थी कि खुद से अजनबी हो गयी? इससे अच्छी तो तन्हाई थी ...
जहाँ भी जाती साथ चली आती, 
अंधेरों में भी साथ जैसे परछाई थी !

और फिर एक दिन अचानक यूँ ही चले आये तुम,
जैसे हमेशा से यहीं कहीं थे मेरे आस-पास।
वो इंतज़ार, वो बेक़रारी, वो तड़प, तुमसे मिलने की,
जैसे कोरी कल्पना से लगने लगे।
चारों ओर फैली तन्हाई की धुंध भी,
तुम्हारे प्यार की तपिश पाकर छटने लगी।
तुमसे हर मुलाक़ात लम्हा दो लम्हा सी,
दिन सरपट दौड़ने और रात उड़ने लगी।
क्या सचमुच हम बिछड़े थे कभी,
या तुम मुझमें ही बसे थे हमेशा
मेरी धड़कन, मेरी सांस, मेरी ज़िंदगी बनकर?

बेशक़ एक अधूरा सा ख़्वाब है मिलना हमारा, 
मगर तुम साथ हो तो हर अधूरा ख़्वाब भी पूरा है।

💓 किरण

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