वो हमसाया


मेरी नज़रों को वो चेहरा अनजाना जकड़ रहा है।
अपने तिलिस्म में मुझे, कोई मुझसा जकड़ रहा है।

जज़्बा-ए-इश्क़, उस पर सुरूर उसकी छुअन का,
मेरे जिस्म ओ' रूह को बेतहाशा जकड़ रहा है।

उसी से वाबस्ता है हर अहसास ओ' सुखन मेरा,
उसका ख़्याल मेरे लफ़्ज़ों को बारहा जकड़ रहा है ।

उसकी बातों में वक़्त तो मुसलसल गुज़रता गया,
 दिल को मगर इक ठहरा सा लम्हा जकड़ रहा है।

पहली मुलाकात का असर रब जाने क्या होगा,
मीलों दूर बैठा वो, हर ख़्वाब मेरा जकड़ रहा है।

इंतज़ार उसे भी है, मुझे भी, बेइंतहा मगर क्या करें, 
कदम कभी दूरियां तो कभी कोरोना जकड़ रहा है ।

ज़ाया तो नहीं जाएगा नसीब का यूँ मिलाना 'किरण'
हर नाउम्मीदी से इतर हमें ये भरोसा जकड़ रहा है।

©विनीता किरण

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