वर्जित



"एक ही ज़िन्दगी है, दूसरा मौका होगा कि नहीं ये कोई नहीं जानता तो क्यों ये इच्छा मन में लिए चला जाऊं इस दुनिया से....एक बार तो करके देख लेना चाहिए था, वो सब जिसे करने से खुद को रोकता रहा ये सोच कर कि ये शायद गलत है ... इसलिए कम से कम एक-एक बार सब करके देखा मगर आदी नहीं हूं किसी चीज़ का, जब चाहे छोड़ भी दिया" 

तब सही या गलत, किसी निर्णय पर नहीं पहुंची थी और न पहुंचना चाहा था क्योंकि तुम जैसे थे वैसे ही पसंद थे, तुम्हें बदलना नहीं था । तुम्हारी सच्चाई से प्यार हुआ था सबसे पहले, जबकि अपना सच, पूरा सच तो चाह कर भी बता नहीं पायी थी जब तलक कि तुम खुद ही न पहुँच गए थे मेरे सच तक...

"झूठ" मेरा रास्ता नहीं था पर सच ने दिया भी क्या था? वो झूठ बस एक ख़्वाब था, जो हकीकत की तरह खुरदुरा नहीं था ... मुलायम चीज़ों की उम्र कम हुआ करती हैं, मेरे झूठ को भी तार-तार हो जाना था । लम्हा दर लम्हा ख़्वाब सा हसीन सफ़र जाने कहाँ ले जाएगा? जब ये मदहोशी टूटेगी तो क्या हम जी पाएंगे उस खुरदरी हकीकत को ? ये कब सोचा था कि जब आंख खुलेगी तो खुद से खुद की पहचान ही न रहेगी या यूं कहूँ कि अपनी पहचान से ही पहचान नहीं रही । 

आज उस मुक़ाम पर खड़ी है ज़िन्दगी कि जी चाहता है एक बार, हाँ सिर्फ एक बार तुम्हारे रास्ते पर चल कर देखूं ... हर उस 'वर्जित' को चख लूं ... जी लूं वो सब एक बार जो कभी न कभी एक ख़्याल की तरह भी दाख़िल हुआ था मन में और जिसे जीने की चाह को सिर्फ इसीलिए दबा दिया कि उन्हें 'वर्जित' की श्रेणी में रख दिया गया एक लेबल लगाकर .. किसने, कब, क्यों .. पता नहीं !

#सुन_रहे_हो_न_तुम

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