सूना-सूना लम्हा


कहीं होकर भी वहाँ न होना, कितना आसान है न .. ठीक वैसे ही जैसे कहीं न होकर भी वहाँ मौजूद होना ?

     जैसे हमारा हर शाम अपने उस पहाड़ी कॉटेज में पहुंच जाना, अपने शहर की तपती हवा को पल में भूलकर उन ठंडी हवाओं को महसूस करना, उड़ते बादलों में चेहरे तलाशना, देर तक तारों का नामकरण करना, बादलों में लुका छिपी खेलते चांद को सबसे पहले थप्पी करना फिर देर तक हँसते रहना ...

      तुमसे फ़ोन पर बतियाते कितनी ही रातें उस कॉटेज में जी हैं, अब भी अक्सर एक चक्कर लगा आती हूँ वहाँ ....पर अब तुम नहीं दिखते, बस एक अहसास होता है कि तुम भी आया करते हो वहाँ... सारी ख़ुशबूओं के बीच तुम्हारी वो अलहदा सी ख़ुशबू बेसाख़्ता लिपट जाती है मुझसे ..
          अरसा हुआ तुम्हारी आवाज़ सुने मगर उस कॉटेज में तुम्हारे-मेरे duets अब भी गूंजते हैं, सुकून भरी थपकियाँ देकर मुझे सुला देते हैं, तुम्हारी बाहों का घेरा बनकर मुझे महफ़ूज़ कर देते हैं और मेरे ख़्वाब तुम्हारी मोहब्बत से आबाद होते हैं ..
      रात गहरा चली है और चुप्पी तोड़ रहे हैं तुम्हारे साज़ और मेरी आवाज़ ...

हाँ, हँसी बन गए, हाँ नमी बन गए 
तुम मेरे आसमां, मेरी ज़मीं बन गए 🎶🎵

#सुन_रहे_हो_न_तुम

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