कुछ रिश्ते कभी विदाई नहीं लेते

कुछ बातें जो बस लबों तक आकर ठहर जाती हैं, बयाँ नहीं होती..
कुछ एहसास जो भीतर बादलों से घुमड़ते हैं, मुलाक़ात नहीं होती..
कुछ दर्द सिसकते तो हैं, सैलाब से उफनते भी हैं, छलक कर बह नहीं जाते..
जिनसे गले लग कर ख़ूब रोने को जी करें, क़रीब नहीं रहते..
जिनसे कहना था अकेले नहीं हो, मैं हूँ न , रहूंगी न हमेशा, अब साथ नहीं रहते..
ये मन भी अजीब है, उन्हीं वीरानों का होकर रह जाता है, जहाँ सवेरे नहीं होते ..
बहुत याद आते हैं वो सब अपने, जो जाकर भी नहीं जाते और न होकर भी कब्जा लेते हैं मन का एक बेहद जरूरी हिस्सा..
जिनके कांधे पर कभी दो आंसू विदाई के नहीं बहाए ये सोचकर कि उन्हें न लगे बेटी पराई हुई, उन्हें कांधा भी दिया..
धीरे-धीरे छुपता गया बेजान शरीर लकड़ियों के ढेर में और बरसों से रुका सैलाब बह निकला ..
जाने आपकी समाधि पर घी ज्यादा था कि हमारे आंसू पर आपको जलाया तो दोनों ने ही ..
आपको सहेज कर रखना था पर आख़िरी निशानियां भी तिरोहित कर आये ..
नहीं कहूंगी बंधे रहो हमसे, उड़ान भरो आप उस खुले आसमाँ में पर एक नज़र हम पर भी रखना कि हम बिखर न जाएं

कुछ रिश्ते कभी विदाई नहीं लेते !

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