कच्चा सा मन

तुम्हारे लगाए पौधे को बहुत प्यार से सींचा करती हूं ... कुछ कतरे धूप छिड़क कर फिर से छांव में ले आती हूँ। एहतियात से नाप तोल कर पानी, खाद सब देती हूं फिर भी रोक तो नहीं सकती फूलों का मुरझाना एक वक़्त के बाद। सूखे फूल उदास कर देते हैं
इसलिए नहीं सहेजा करती उन्हें किताबों में, दराजों में या डब्बों में
पर सुनो मैं नहीं डालती उन्हें कूड़ेदान में भी...बस हथेलियों में भर, आहिस्ता से उछाल देती हूं
पीछे गली में खुलने वाली
खिड़की से बाहर ...वहाँ अब भी बचा हुआ है थोड़ा सा कच्चा फर्श .. कोई बीज शायद मुझसे दूर रहकर ही सही, पनप जाए ..
      सर्द थपेड़ों से जड़ हो चुकी मन की दीवारों के भीतर भी रख छोड़ा है एक कच्चा कोना बहुत संभाल कर जहाँ मुट्ठी भर उदासी में एक चुटकी उम्मीद की मिलावट अब भी करती रहती हूं चुपके से !

#सुन_रहे_हो_न_तुम

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