कल्पना

जाने कितने फ़ासले तय करती है कल्पना ,
कुदरत से जन्मी ,कुदरत में ही मुक़म्मल होने के इंतज़ार में...
बिखरते हैं, सिमटते हैं, निखरते हैं लम्हे कल्पना की परिधि में 
मगर तल्ख़ हक़ीक़त अक्सर खरोंच दिया करती है उनके मख़मली पैरहन..


मेरे चित्रकार,
एक परत गहरे, चटख, अमिट रंग की मुझ पर भी चढ़ा दो न !


💕 किरण


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