तुमसे ही ...

अब जाने क्यों हैरत नहीं होती
तुम्हारी किसी बात पर
ऐसा लगता है जैसे सब कुछ तयशुदा ही हो रहा
तुम सब वही तो करते हो, कहते हो
जो मुझे लगता था तुम करोगे, कहोगे।
मेरे अल्फ़ाज़ और उनमें गुंथे गहरे एहसास
तुम्हें यूँ ही अपने से नहीं लगते
ये सब जीये हैं मैंने
ये सब मेरी कहानी का हिस्सा हैं
और तुम वह किरदार
जिसके बिना मेरी कहानी का आरंभ ही न होता ...

न जाने कितने ख़त लिखे होंगे तुम्हें
कितनी बातें की होंगी तुमसे
उन ख़ामोश रातों में
जब अपनी धड़कनें भी साफ सुनाई देती थीं
रेडियो पर कोई रूमानी गीत सुनकर  जाने कितनी बार ख़ुद को बाहों में भरा होगा
सुनो तुम्हारे साथ बुने वे सब दृश्य और  संवाद
मुझे कभी काल्पनिक लगे ही नहीं
तुम हमेशा से जीते रहे मुझमें
और जिलाए रखा मुझे भी
उस जड़ की तरह जो मिट्टी के भीतर हरी रही
अपनी तमाम डालियाँ मुरझा जाने के बाद भी ..

💕 किरण

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