निरंतर

उम्र का ये अजीब दौर है !
जिम्मेदारियों की तल्ख़ धूप भी
तो तन्हाई में पसरी परछाइयाँ भी...
अपने लिए छांव का एक टुकड़ा तलाशती,
जलती हुई पगथलियां,
शाम ढलने तक भूल जाती है तपिश...
रात और नींद के संघर्ष के बीच
क्षणिक सा विश्राम
और फिर लौट आना
अजनबी परछाइयों का...
बेचैन करवटों के साथ अगली सुबह का इंतज़ार ..
जैसे अल्प युद्ध विराम के बाद
लौट आना युद्ध क्षेत्र में !

💕किरण

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