अलविदा

"साधना तुम रुकोगी नहीं, मिलना नहीं चाहती उनसे जो सोनू को अपने परिवार में शामिल करने जा रहे ?", बालिका गृह की संचालिका राधिका ने कुर्सी से उठती हुई साधना से पूछा, हालांकि अच्छे से जानती थी साधना की प्रतिक्रिया क्या होगी ।
"नहीं राधिका कुछ जरूरी काम है, मुझे जाना होगा", कहते हुए साधना तेजी से बाहर निकल गयी ।
दरवाज़े के बाहर आकर ठिठकी साधना की आंखों के आगे दो महीने पहले का वो वाकया किसी चलचित्र की तरह गुज़र गया, जब रेड लाइट एरिया से 6 वर्षीय मासूम सोनू को उसने पुलिस की मदद से बचाया था। उसके परिवार की कोई जानकारी न मिलने के कारण कोर्ट ने बालिका गृह के सुपुर्द कर दिया सोनू को और उसका सारा खर्च तब तक साधना ने अपने एन जी ओ से स्पांसर किया था जब तक कि कोई परिवार उसे गोद न ले ले । जाने कैसी कशिश थी उस मासूम में कि पिछली कुछ मुलाकातों में साधना उससे जुड़ती चली गयी और आज जब उसे गोद लेने कोई आ रहा है तो भारी मन से उस मासूम को आख़िरी बार देखने चली आयी थी । फिर भी उसे जाते हुए अलविदा कहने की हिम्मत नहीं जुटा पायी थी। यूँ भी उसके लिए अलविदा कहना कभी आसान नहीं रहा बीस साल पहले की उस शाम के बाद ... अपने ख़्यालों को झटक कर साधना ने मुख्य द्वार की ओर कदम बढ़ाया ही था कि सामने से आते व्यक्ति पर नज़र पड़ते ही जैसे कदम वहीं स्थिर हो गए।
      बीस वर्ष पहले भी ऐसी ही तो शाम थी, नीले आसमान के चेहरे पर उदासी की सलेटी लकीरें और गहराती लाली जैसे रुलाई रोके कोई जबरन मुस्कुराने की कोशिश कर रहा हो। आधा-अधूरा सा चाँद भी उसकी उदासी भांपकर बदलियों के पीछे छुपते-छुपाते चुप्पी साधे एक ओर खड़ा था। उसी बूढ़े बरगद के नीचे वाली लाल बेंच पर साधना और करुणेश बैठे थे आख़िरी बार, जो उनकी गहरी दोस्ती की गवाह थी और उस मूक प्रेम की भी जिसका इज़हार दोनों ही कभी शब्दों में नहीं कर पाए। कुछ रिश्ते न शब्दों के मोहताज होते हैं न इज़हार के, वे बस होते हैं और जीते हैं दिलों में, बस ऐसा ही तन्हाई और सुकून का रिश्ता था साधना और करुणेश का। एक असफल विवाह का स्वेच्छा से निबाह करती साधना और सब कुछ जानते हुए भी स्वयं को आकंठ प्रेम में डूबने से बचा न पाया था करुणेश ... साधना के एक ख़त ने उस दोस्ती की सीमा तय कर दी थी और दोनों ही अपने मूक प्रेम को दिल में दबाए उस दिन बिना कुछ कहे एक दूसरे से हमेशा के लिए विदा हो गए ।
     बीस वर्ष यूँ तो लंबी अवधि होती है मगर जाने क्यों आज बीस वर्ष दोनों के बीच से यूँ गुजर गए जैसे बीस पल ! 
           "ये शाम बहुत लंबी थी, देखो न अब तक खड़ी है हमारे बीच ... न वो रात आयी जो अपनी बाहों में थाम सुकून दे पाती न वो सुबह जो तुमसे मिलने का संदेश लाती...", करुणेश की आंखें आज भी उस प्रेम की निशानियां ढूंढ रही थी साधना की आंखों में जिसे बीस साल में भी अपने दिल से नहीं निकाल पाया था ।
    "कोई शाम ऐसी होती हैं जिसके नसीब में केवल सफ़र होता है मंज़िल नहीं तभी तो रास्ते सामने से गुजर जाते हैं मगर कदम नहीं बढ़ पाते उन पर ..", साधना ने धड़कनों पर काबू पाकर, नज़रें झुकाए धीमे से बुदबुदाते हुए कहा ।
"आज मैं पापा बनने जा रहा हूँ, मेरी खुशी में शामिल नहीं होओगी?" करुणेश के स्वर में आग्रह था इसी बहाने साधना के साथ कुछ समय बिताने की मोहलत पाने के लिए।
"क्या तुम ही सोनू को... ओह ये तो बहुत खुशी की बात है वो तुम्हारे साथ रहेगी, अब मैं निश्चिन्त हो सकती हूँ... बहुत प्यारी बच्ची है वो.. पर मैं रुक नहीं पाऊँगी, बहुत जरूरी काम है ", एक गहरी सांस छोड़ते हुए साधना ने कहा और करुणेश के पास से गुजर कर दरवाज़े की और बढ़ गयी।
"आज भी अलविदा नहीं कह सकती न मुझे ... न सही बस एक बार मेरी आँखों में देखकर मुस्कुरा ही दो। कम से कम बाकी की ज़िंदगी इस आस में गुजर जाएगी कि मुझे बीस वर्ष पहले के उस इनकार का जवाब कभी तो मिलेगा ...", करुणेश की गहरी आवाज़ ने जैसे कितने ही बांध ढहा दिए साधना के भीतर और आंखें भीगती चली गयीं...
©विनीता किरण

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