पगली

"पगली है क्या,
कितना हँसती है !"
कभी टोक दिया करती थी उसे माँ,
खिलखिलाकर हँसती और फिर
बरसने लगते थे आंखों से मोती ।
हाँ ... आज भी हँसती है वो
बात-बात पर,
बरसते हैं अब भी मोती
पर इन दिनों तो
बाढ़ सी आ जाती है जैसे
फिर भी नहीं रुकती उसकी हँसी,
अब लोग भी 'पगली' कह देते
पर बुरा अब भी नहीं लगता उसे।

एक ही फर्क़ है,
जो कोई नहीं समझता,
कभी खुशियाँ बरसा करती थीं
अब बहता है
दर्द,
बिखरे सपनों का,
अधूरी ख्वाहिशों का !

©Vinita Surana Kiran

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