आगे वाली सीट

अपने स्टॉप से आज फिर बस में चढ़ते ही निगाह सीधे आगे की सीट पर पड़ी । वह आज भी वही बैठा हुआ था पहली सीट पर खिड़की के पास वाली ... ये भी जानती थी बस 3 स्टॉप और फिर उसी सीट पर कोई और बैठी होगी, वही जिसके लिए हर रोज वह सीट रोकता है । बस के पहले स्टॉप से चढ़ने वाला वह लड़का दो टिकट लेता था रोज, एक कॉमर्स कॉलेज तक की खुद के लिए और दूसरी महारानी कॉलेज तक की उस लड़की के लिए जिसे यूनिवर्सिटी से चढ़ते ही वह अपनी सीट दे देता था और साथ ही उसका बस टिकट भी (अपने स्टॉप पर दिखाना होता था न कंडक्टर को)
जाने कब ये सिलसिला शुरू हुआ नहीं जानती मैं पर एक ख़ूबसूरत मोड़ की मैं साक्षी रही उस दिन जब मैं बस में चढ़ी और आगे की दोनों सीटों पर उन दोनों को हाथों में हाथ लिए खिलखिलाते देखा । उस दिन के बाद ज़रूरत जो नहीं  रही किसी एक को दूसरे के लिए सीट रोकने की... और हाँ वो कलाइयों में दमकता लाल चूड़ा बेहद मनमोहक था ❤

©विनीता सुराना किरण

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