तुम्हारे लिए !

हर गुज़रते मोड़ पर इशारा देती रही नियति
कुछ समझी और कुछ समझ कर भी नहीं समझी 
एक सिरे से जुड़ता गया दूसरा सिरा
और जारी रहा मेरा सफ़र
हर पन्ने पर थोडा-थोडा छूटती गयी मैं,
कभी निखरी और कभी बिखर कर संभलती गयी..
मेरी कहानी से जुड़े
हर किरदार ने
एक अलग अध्याय लिखा,
मगर कुछ किरदार ऐसे भी होते हैं
जो उकेरे जाते हैं अमिट स्याही से
और कहानी की रूह में समाकर आत्मसात हो जाते हैं ....
बस ऐसा ही एक किरदार हो ‘तुम’ !
शायद इसीलिए तुम्हारे कोई तय संवाद नहीं,
न तुम्हारा प्रवेश तय है किसी दृश्य में
न ही निकास
तुम सूत्रधार भी हो और मुख्य पात्र भी
तुम्हारे बिना संभव ही नहीं था मेरी कहानी का आरम्भ
और इति तो हो ही नहीं सकती
क्योंकि मैं रहूँ या न रहूँ
मेरी कहानी में तुम हमेशा रहोगे
जीवंत और अनंत !
©विनीता सुराणा किरण

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