क़ता

नम मिट्टी लेकर ख़्वाबों की, आओ कुछ लम्हात बुनें।
महक उठे मन दोनों का ही, ऐसे कुछ जज़्बात बुनें।
एक सुराही गढ़ कर उसमें, भर ले प्रीत लबालब हम,
छलक-छलक जो हमें भिगोये, ऐसे प्रेम-प्रपात बुनें।

©विनीता सुराना 'किरण'

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