कहा था न !

कहा था न !
क़रीब मत आना
और आओ तो
दूर मत जाना ..
हाँ नासमझ हूँ !
दिमाग़ में
तर्क़ के बीज
जड़ पकड़ पाएं,
उससे पहले ही
दिल में उमड़ते
सागर की लहरें
बहा ले जाती हैं मुझे...
कितनी बार कहूँ
कोई चाहत नहीं,
कोई अपेक्षा भी नहीं,
अगर कुछ है
तो बस मुहब्बत,
सिर्फ़ देना ही तो चाहती हूँ
फिर क्यूँ बंद कर लेते हो
सब खिड़की दरवाज़े
कि मेरे ख़्याल भी
पहुँच नहीं पाते
तुम तक ...
©किरण

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