अधूरी कहानियाँ

बारूद के धुंए से होकर गुज़रने वाली
हर सड़क,
हर पगडण्डी
कितनी कहानियाँ धूमिल करती जाती हैं...
मुरझा जाते हैं कुछ ख़्वाबों के नरम पौधें,
कहीं टूटते है कच्चे बांध,
कहीं सूख जाती हैं नन्ही झीलें भीतर ही,
कुछ लावारिस फसलें चर जाया करते है आवारा पशु
बूढी बाड़ रोक नहीं पाती उन्हें,
अबोध किलकारियां मलहम नहीं बन पाती
क्योंकि कुछ घाव भरा नहीं करते,
मुँह चिढ़ाते है इंद्रधनुष के रंग
हर बेरहम बारिश के बाद,
मिट्टी की सौंधी ख़ुशबू खो जाती है,
जब चन्दन की लकड़ियों से उठती है दुर्गन्ध
उन अधजली ख़्वाहिशों की...
ये अधूरी कहानियाँ कभी पूरी नहीं होतीं,
बारूद की गर्मी में सूख जो जाती है
जीवन की स्याही !
©विनीता सुराना 'किरण'





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