एक बेनाम ख़त # 3

बरसों बरस गुज़र गए
उस रहगुज़र की तलाश में
जो तुम से मिला दे,
तुम तक पहुँचने की आरज़ू ने
थकने नहीं दिया
रुकने नहीं दिया
मगर अंतहीन हो जब सफ़र
तो थक ही जाता है मन,
भले कुछ कहता नहीं
पर अक़्सर ठिठक जाता है
किसी दोराहे पर
इस आस में कि शायद
ये मोड़ आख़िरी हो
और पगडंडी ही सही
पर मिल जाए वो राह
जो तुम तक पहुँचा दे
और दो पल ही सही
तुम्हारे आग़ोश में
सब कुछ भूल जाऊँ.....
वो लंबा इंतज़ार
वो हर पल बिखरती आस
वो अनकही बातें
सारे शिक़वे....
कुछ क़र्ज़ भी तो है तुम पर मेरे,
उनींदी रातें
कुछ बेचैन ख़्वाब
भीगी सलवटें
तन्हा करवटें
अधूरे गीत
बिखरे अशआर
रूठी कविताएँ....
सोचती हूँ क्या कभी मिलोगे
और मिले तो चुका पाओगे ये क़र्ज़
या फिर कर जाओगे पलायन एक बार फिर
और मैं यूँ ही भटकती रहूँगी
तुम्हारी जुस्तजू में....
©विनीता सुराना 'किरण'

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