ग़ज़ल


ये तुम्हारे न ही हमारे हैं
रौशनी बाँटते सितारे हैं

बंद मुट्ठी ज़रा खुली देखी
पंख ख्वाबों ने फिर पसारे हैं

वक़्त लिखता रहा फ़साने यूँ
रेत के सब मगर वो धारे हैं

कब मुलाक़ात हो न जाने अब
दो घड़ी के सभी सहारे हैं

है अंधेरों से डर भला कैसा
इक 'किरण' से अँधेरे हारे हैं
©विनिता सुराना 'किरण'

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