तुम क्यूँ नहीं पास हमारे ?

ख़ामोश रात, चाँदनी उदास
पूछ रहे हैं गुमसुम तारें
तुम क्यूँ नहीं पास हमारे?
बहके जज़्बात, उलझे एहसास
तन्हा से दिखते सभी नज़ारे
तुम क्यूँ नहीं पास हमारे?
नम हैं आँखें, साँसें विरहन
ग़मगीन हवा बस तुम्हें पुकारे
तुम क्यूँ नहीं पास हमारे?
गुम हैं नींदें, उजड़े ख्वाब
शाखों से बिछड़े पत्ते सारे
तुम क्यूँ नहीं पास हमारे?
विछोह ये कैसा, कैसी प्यास?
महक भी रूठी गुलों से प्यारे
तुम क्यूँ नहीं पास हमारे?
थमी सी लहरें, पसरी तनहाई
ओझल हो गए मिलन के धारे
तुम क्यूँ नहीं पास हमारे?
©विनिता सुराना 'किरण'

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