पन्ने


डायरी के जर्द पन्नों में,
ख़ुद को पढ़ती हूँ अकसर
माज़ी के धुँधले आईने में,
तलाशती हूँ अक्स अपना
लड़कपन से सहेजे फूलों में,
मिलती हूँ बीते लम्हों से
फीके हो चले कुछ लफ्ज़,
जिलाती हूँ वक़्त की स्याही में
सर्द खामोशी में लिपटे नगमों को,
पिघलाती हूँ प्रेम की तपिश से...
जानते हो न ........
तुम भी एक अटूट हिस्सा हो इन पन्नों का
इस सन्नाटे के उस पार से
चली आती है खुशबू
हमारी मुहब्बत की,
उस अनकहे रिश्ते की
और महक उठते हैं
नगमें कई
इस ख़ामोशी में ....
बस यूँ ही बहलाती हूँ अक्सर ख़ुद को
डायरी में दफ़्न
कुछ हसीन किस्सों से.
©विनिता सुराना ‘किरण’

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