प्रेम


ठिठक जाते है कदम
देखता हूँ जब
सुनहरी भोर में दमकती
संगमरमरी धरोहर
इतिहास की
जहाँ दफ़न है
कुछ इबादतें
कुछ किस्से
कुछ भ्रांतियाँ
कुछ चीखें भी
इश्क है
मुहब्बत है
जुनूं है
बेबसी भी |
जहाज़ हूँ रेतीले धोरों का
और गवाह भी
कुछ अमिट प्रेम गाथाओं का
जो आज भी महकती है
मरू की कोमल रेत में
और देती है विश्वास
अनगिनत धड़कते दिलों को
एक शाश्वत प्रेम का |
©विनिता सुराना 'किरण'

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