ग़ज़ल

हवा में घुल गयी खुशबू वो जब भी मुस्कराए है
छुआ जो हाथ ने उनके हज़ारों गुल खिलाए है

नसीबों की ये बातें है मिली है रौशनी कैसे
कहीं जलती शमा देखी किसी ने दिल जलाए है

चलन है ये ज़माने का समझ ले तू ज़रा नादाँ
उड़ाकर नींद औरों की वो खुद सपने सजाए है

मिले तुझको सदा ही छाँव मुरझाए न ये रंगत
तेरी खातिर ही राहों में शज़र कितने लगाए हैं

घरोंदे है ये रेतीले संभल कर तुम ‘किरण’ चलना
नमी अश्कों की देकर के जतन से यूँ जमाए है
-विनिता सुराना 'किरण'

Comments

Popular posts from this blog

Chap 20 Can Life Take A U-turn

The Unsent Letter

ज़ायके से जश्न-ए-बहारा तक