ग़ज़ल

सुकूँ दिल को तेरा ही नाम देगा 
कहाँ राहत कोई अब जाम देगा

लुटा हम आसमां बैठे किसी पे
वफ़ा का चाँद ही पैगाम देगा

न आँखों में नमी लाना कभी तुम
वगरना अश्क भी इल्ज़ाम देगा

कदम जो उठ गए तो रोकना क्यूँ
कोई पत्थर तुझे आराम देगा

कभी जो ज़िक्र भी उसका हुआ तो
'किरण' रिश्ता कोई बदनाम देगा
-विनिता सुराना 'किरण'

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