ग़ज़ल (8)
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क्यूँ न फिर गीत मधुर प्रीत के हम गाएं वो
ख्वाहिशें आज सभी माँग चलो लाएं वो
जो मुड़े मोड़ कभी आज वहीं है फिर हम
दो कदम वो जो चलें साथ हमें पाएं वो
ख्वाब जो टूट गए आज सजा दे फिर से
फूल जो सूख गए काश महक जाएं वो
वक़्त बेवक्त तेरी याद चली आती है
काश इक बार तुझे साथ ही ले आएं वो
तीरगी जान हमारी न 'किरण' ले ले अब
साथ देने की कसम आज कहो खाएं वो
-विनिता सुराना 'किरण
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