ख्वाहिश

कच्ची धूप सी अधखिली,
वो लड़कपन की ख्वाहिश,
अलसभोर के उनींदे ख्वाब
के सच होने की ख्वाहिश,
कैद थी अंतस की परतो में,
सिमटी सी सकुचाई सी,
तन्हाई में अक्सर दे जाती,
अपने होने का एहसास.
सोचती हूँ क्यों न अब,
उसे दे दूँ पंख उम्मीद के,
रंग आत्मविश्वास का
और सहला कर हथेली से,
छोड़ दूँ खुले आसमान में,
उड़ने के लिए स्वच्छंद.
शायद कभी छू पाए उस ऊँचाई को
और बिखेर दे इन्द्रधनुषी रंग.
-विनिता सुराना 'किरण'

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