सुरक्षित (बाल कविता)

नन्हा सा वो मृग-शावक,
निर्भय अलमस्त सा,
गुलांचे भरता जा पहुँचा,
वन के छोर पर.
खूब खायी हरी-हरी घास
और पीया चश्मे का शीतल नीर,
सोचा मन ही मन में,
क्यों माँ रोका करती थी ?
"घर के पास ही रहना...दूर न जाना"

हर दम टोका करती थी.
कितना मनोहर कितना शांत,
कुछ समय करूँगा यहीं विश्राम.
मंद-मंद बहती वायु,
और घनेरी छाँव मिली,
तो निद्रा ने आ घेरा.
खोया सुन्दर सपनों में,
हुआ घनघोर अँधेरा.
आँख खुली तो जी घबराया,
दूर तक था निर्जन वन
और सन्नाटा था छाया.
कदमों की सुनकर आहट,
सूखे पत्तों की सरसराहट,
हुआ मन भयभीत,
तब याद आई घर की
और आई याद माँ की सीख.
काश ! न यूँ घर छोड़ा होता,
संग परिवार सुरक्षित होता.
रुखी सूखी खाकर भी,
घर में जीवन रक्षित होता.
-विनिता सुराना 'किरण'

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