वादा

एक 'किरण' आशा की
चमकती है अक्सर
उन सजल आँखों में,
एतबार है लौट आने का
किया था एक वादा उसने
दूध का क़र्ज़ निभाने का.
टकटकी सी लगाए
देखा करती है,
उस सूनी सी पगडण्डी को…..
कभी जब भ्रम सा होता है
उसके दौड़ते हुए आने का,
तो लपक कर उठा लाती है
आरती की थाली
रोली-मोली, गुड की भेली वाली……  
कहाँ जानती है !
वो धुंधली सी नज़र,
अंतहीन है उसकी प्रतीक्षा……
रम कर एक अलग संसार में,
विस्मृत कर चुका है,
"वादा" वो अपना
-विनिता सुराना 'किरण'

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