ग़ज़ल (5)



अब उठो कुछ रास्तों का भान लो तुम चल पड़ो
हार के रुकना नहीं ये मान लो तुम चल पड़ो

मुश्किलें है हर कदम पे जानते है हम मगर
हौसलों के तीर सारे तान लो तुम चल पड़ो

धूल भी सोना बनेगी मन में जो विश्वास हो
रख भरोसा बाजुओं पर ठान लो तुम चल पड़ो.

साथ कोई भी किसी का दूर तक देता नहीं
है अकेला हर कोई ये जान लो तुम चल पड़ो.

हो अँधेरे राह में रुकना नहीं देखो 'किरण'
आस के रत्नों की उजली खान लो तुम चल पड़ो.
-विनिता सुराना 'किरण'

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