नीति दोहे १




पीर पड़ी ज्यों आप पे, नैना भर-भर रोय |

पर-पीड़ा जो जान ले, पीड़ा काहे होय ||

 

दीपक रखे  मंदिर में, घर का तम ना खोय |

मन को रोशन जो करे, तन भी उजला होय ||
-विनिता सुराना

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