Betiyaan

सुबह की निर्मल धूप है
प्रेम का निश्छल रूप है
गंगा-जल की कलसी है
घर -आँगन की तुलसी है.


कुल-दीपक नहीं बाती है
घर-आँगन महकाती है
असंख्य खुशियाँ लाये वो 'विनी'
दुःख में भी साथ निभाती है.

फूलों सी वो कोमल है

कांटो पर सो जाती है
शांत नदी वो पावन सी
तूफानों को सह जाती है.

कभी राधा प्यारी है

कभी जनक दुलारी है
कुल की जन्मदात्री है
जीवन की सहयात्री है.

शक्ति-पुंज वो दुर्गा का

काली भी बन जाती है
सखी बन प्रेम लुटाये वो
संहारक भी बन जाती है.

बाबा की आँखों का तारा है

माँ का अखंड सहारा है
हर घर की वो ज्योति है
कोई और नहीं वो बेटी है.
BY- Vinita Surana

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