एक और अधूरी मुलाक़ात
आज नहीं खोलूँगी डायरी ...नहीं मिलूँगी तुमसे ...कुछ पल तो मुझे बस अपने साथ रहने दो .. धत्त !!!! मैं भी कितनी बुद्धू हूँ अपना साथ मुझे कब मिला तुम्हारे बगैर ? चलो फिर एक मुलाक़ात ... तुमसे, तुम्हारे अनोखे ख़्वाबों से, अक़्सर हँसती थी उन पर अब लगता है काश सब जिए होते तुम्हारे साथ ! आज फिर भीगी है फ़िज़ा थिरक रही हैं बूँदें, थिरक रहा है बावरा मन .. नम हवा फिर भिगो रही है मेरा चेहरा महसूस कर रही हूँ स्पर्श तुम्हारा.. तुम्हें पसंद है न ये महक गीली मिट्टी की ? मुझे भी ... पर तभी जब 'तुम' घुले हों उसमें ! तुम्हारे साथ हर मुलाक़ात अधूरी सी लगी... मन कभी भरा जो नहीं . आज एक अधूरी मुलाक़ात और सही .... ©विनीता सुराना 'किरण'