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एक और अधूरी मुलाक़ात

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आज नहीं खोलूँगी डायरी ...नहीं मिलूँगी तुमसे ...कुछ पल तो मुझे बस अपने साथ रहने दो .. धत्त !!!! मैं भी कितनी बुद्धू हूँ अपना साथ मुझे कब मिला तुम्हारे बगैर ? चलो फिर एक मुलाक़ात ... तुमसे, तुम्हारे अनोखे ख़्वाबों से, अक़्सर हँसती थी उन पर अब लगता है काश सब जिए होते तुम्हारे साथ ! आज फिर भीगी है फ़िज़ा थिरक रही हैं बूँदें, थिरक रहा है बावरा मन .. नम हवा फिर भिगो रही है मेरा चेहरा महसूस कर रही हूँ स्पर्श तुम्हारा.. तुम्हें पसंद है न ये महक गीली मिट्टी की ? मुझे भी ... पर तभी जब 'तुम' घुले हों उसमें ! तुम्हारे साथ हर मुलाक़ात अधूरी सी लगी... मन कभी भरा जो नहीं . आज एक अधूरी मुलाक़ात और सही .... ©विनीता सुराना 'किरण'

One Rank One Pension (OROP)

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I do feel ashamed to ask for OROP. At the end of all this what did I really do? Ofcourse I did one tenure of Leh, flying at 20,000 feet plus altitude, then one tenure flying at North Sikkim again at 20,000 feet plus of altitude (with no integrated Oxygen masks, which my country could not procure for 22 years I was in uniform) and one ground tenure at Gurez - oh that ? it was only at 14,000 fe et stay for 2 years - a cake walk. The doctors do advice there should be no more than 2 tenures at high altitude - but I am sure they would have some vested interests in saying so. But then look at the hardships of my counterpart bureaucrat - He had tough decisions to make - there were power cuts every now and then in those days over and above he had to handle the pressure of politicians, and imagine the pressure of getting some tons of money home and trying to hide it. He could not comfortably sleep over it as they poked his back through the mattresses. He was living perpetual fear. Anyone can...

A survivor refugee from Calais tells

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You’re 29 years old with a wife, two children and a job. You have enough money, and can afford a few nice things, and you live in a small house in the city. Sud denly the political situation in your country changes and a few months later soldiers are gathered in front of your house. And in front of your neighbors’ houses. They say that if you don’t fight for them, they will shoot you. Your neighbor refuses. One shot. That’s it. You overhear one of the soldiers telling your wife to spread her legs. Somehow you get rid of the soldiers and spend the night deep in thought. Suddenly you hear an explosion. Your house no longer has a living room. You run outside and see that the whole street is destroyed. Nothing is left standing. You take your family back into the house, and then you run to your parents' house. It is no longer there. Nor are your parents. You look around and find an arm with your Mother’s ring on its finger. You can’t find any other sign of your parents. ~~~~~ "B...

मरु और ताज़

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ठहर जाते है कदम बरबस ही देखती हूँ जब सुनहरी भोर में दमकती संगमरमरी धवल धरोहर इतिहास की , प्रेम की ,  वो हसीन ताज़महल ! सोचती हूँ अजूबा है वाकई एक ख़ूबसूरत इमारत , जो समेटे है ख़ुद में कितना कुछ .... जहाँ दफ्न है एक प्रेम कहानी , कुछ इबादतें  कुछ किस्से कुछ भ्रांतियाँ कुछ चीखें भी , इश्क है मुहब्बत है जुनूं है बेबसी भी...... तब याद आती है उन रेतीले धोरों की जो मेरे अपने हैं जहाँ उजली सुनहरी धूप में दमकते है एहसास मुहब्बत के , और शीतल चाँदनी सजाती है अनगिनत ख्वाब हसीन , जो गवाह हैं अमिट प्रेम गाथाओं के , जो आज भी महकती है मरू की कोमल रेत में और देती है विश्वास अनगिनत धड़कते दिलों को एक शाश्वत प्रेम का...... नहीं हैं पत्थर से कठोर न छुपाये है कोई राज़ कहीं बस गूँज है तो नगमों की जो मुहब्बतों ने गाये आँसूं भी जज़्ब करते हैं और सहलाते है उदासियों को छुपा लेते हैं आग़ोश में जब तन्हा हो दिल.... रुकते नहीं है तब क़दम पुकारता है जब मरु प्रीत है और प्यास है इक हसीं एहसास है दूर दिल से ताज़ वो...

एक बेनाम ख़त # 4

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आज फिर एक नाक़ाम कोशिश ! हाँ ....नाक़ाम ही तो है कोशिश तुम्हें अल्फ़ाज़ में बाँधने की हर्फ़ जोड़ती हूँ जब भी कुछ छूट ही जाता है ... देखो न ...ये बिखरे हुए पन्ने कुछ आधे भरे, जिनमें ज़िन्दगी है कुछ लम्हें है तुम्हारे संग बिताये कुछ शरारत में डूबे कुछ मुहब्बत में भीगे... कुछ आधे खाली, मेरे उन ख़्यालों की तरह जिन्हें लफ़्ज़ नहीं दे पायी उन एहसासों की तरह जो तुम तक नहीं पहुँचे... आज भी तो अब्र घनेरे थे जाने क्यूँ नहीं बरसे जाने क्यूँ छू नहीं पायी क़लम तुम्हारी आँखों की वो गुलाबी कशिश तुम्हारे लबों की वो शरारत वो साँझ की लाली में तुम्हारा बाहें फैलाकर ....मौन निमंत्रण तुम्हारी शोख़ मुस्कराहट एक और ख़त ! बेनाम और अधूरा ... ©विनीता सुराना 'किरण'

पन्द्रह अगस्त (दो लघु कथा )

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देश अपनी स्वतंत्रता की ६९ वी सालगिरह मना रहा है, इसी ख़ुशी में जेल से 12 कैदियों को रिहा किया जा रहा था, उनमें एक काशी भी थी | सात वर्ष की सज़ा उस जुर्म के लिए जो उसने किया भी नहीं था परन्तु माँ की ममता कैसे अपने बेटे को सलाखों के पीछे जाते देखती सो ले लिया अपने सर उस हत्या का इल्ज़ाम जो एक दरिन्दे से उसको बचाते हुए उसके बेटे के हाथों हो गयी थी | 15 अगस्त का सूर्योदय उसके लिए आज़ादी लाया और बेटे को अपने सामने देख काशी की ख़ुशी का ठिकाना नहीं था | घर के दरवाज़े पर खड़ी बहू और गोद में एक नन्ही गुड़िया को देखकर तो काशी बावरी हुई जा रही थी, पर ये क्या बेटा तो उसे घर के पिछवाड़े की ओर लिए जा रहा था, “माँ तुम्हारे लिए वो पीछे वाले छोटे कमरे को तैयार करवा दिया है, तुम तो जानती हो न लोगों की जुबान ... आख़िर तुम भी तो नहीं चाहोगी कि तुम्हारे बेटे-बहू को किसी के आगे शर्मिंदा होना पड़े....” पिछवाड़े के उस अँधेरे कमरे में खाट पर बैठी काशी याद कर रही थी जेल की कोटरी का वो छोटा सा रोशनदान जिससे हर सुबह चुपके से सूरज की कुछ किरणें चली आती थी, उसकी आज़ादी की उम्मीद लेकर ! *************** 15 अगस्त यानि ...

एक बेनाम ख़त #2

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आज फिर बेचैनी है शाम से ... नहीं ! कारण तुम्हारी व्यस्तता नहीं उसकी तो आदत हो चली अब, यूँ भी हमारे बीच कबसे अबोला है, शब्दों का नहीं विचारों का, शब्द हमारे बीच से यदा-कदा गुज़रते रहते हैं बस तुम्हारे मेरे बीच पुल नहीं बनाते.... कारण मेरी तन्हाई भी नहीं वो तो सहेली बन चुकी मेरी... शाम पूरे शबाब पर है जैसे विदाई की दहलीज़ पर दुल्हन सिन्दूरी आसमान सिरहन सी देती ठंडी बयार मानो धीमे-धीमे बज रही हो शहनाई दूर हल्के से टिमटिमाते तारें जैसे सजी-धजी बारात मानो चाँद के आने की राह देख रहें हो पर फिर भी मन बेचैन है... आज फिर से याद आया है वो ख़्वाब जो मेरी आँखों में झिलमिलाया था कभी, अपनी तन्हाई के सिवा किसी से साझा नहीं कर पाई , तुमसे भी नहीं, मेरे ख़्वाब अज़नबी जो लगते थे तुम्हें... बहुत हिफाज़त से संभाल कर पलकों में छुपाया था, अश्क़ों में नम वो ख़्वाब बहुत देर तक ठहरा था भीतर फिर ख़ुद ही डूबता चला गया उस खारे समंदर में और कभी नहीं उबरा... मैंने भी कहाँ रोकने की कोशिश की रोक कर करती भी क्या आख़िर कब तक बचा पाती, उसे सैलाब के संग बहने से, हमेशा के लिए खो जाने से... बस उस...